भाग न तू युद्ध से ,पीठ अपनी मोड़ कर ,
कर प्रशस्त पथ आप ,सीना शिला का तोड़ कर ।
जिंदगी एक युद्ध है ,संघर्ष का प्रतिरूप है ,
इसमें लेकिन छांव भी है ,न कि केवल धूप है ।
कर बड़ा प्रयास कि पा सके ऊँचे शिखर को ,
हार कर भी रह जुटा ,न रोक तू अपने सफ़र को .
आस रख की जीत से ,यह सफ़र होगा ख़तम ,
दूर कर विषाद मन से , तेज़ कर अपने कदम ...
Wednesday, September 9, 2009
तेज़ कर अपने कदम...
Tuesday, September 1, 2009
टूट पड़ने तक !!
गहरी उदास साँझ के बाद ,
रात की श्याम स्याही ,
पिघलकर टपकती ,
ह्रदय में बूँद- बूँद लगातार
पहर ढलने तक
अबूझ तारों की पहेली
एक कठिन, अनसुलझा गणित ...
एक कठिन, अनसुलझा गणित ...
दूरियां पातीं विस्तार
फ़ैल जाता दुःख,
उलझ जाते जिंदगी के तार ,
टूट पड़ने तक !!
वो कौन है??
मौन है ये जगत क्यूँ ,
क्यूँ नहीं कुछ बोलता
किसलिए हिय दर्द भी ,
नहीं क्रुद्ध होकर चीखता ??
किसलिए है शांत मन
प्रतिकार भी क्यूँ मौन है
जग के किये अन्याय पर,
जग के किये अन्याय पर,
जो रो रहा वो कौन है??
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