निःश्रुत ..
Wednesday, November 16, 2011
मेरे हाल का तमाशा है अभी
"मेरी ख़ामोशी को कुछ और नया नाम न दो
मैं वो बच्चा हूँ, खिलौना मेरा टूटा है अभी
हैं बड़े शौक तमाशों का तजुर्मा मुझको
फिर कभी छेड़ो,मेरे हाल का तमाशा है अभी "
आज की रात इन आँखों में बसर होने दो
हाथ
न
छोडो
,
नजरें
न
हटाओ
मुझसे
,
होश
बाकी
हैं
अभी
बेखबर
होने
दो
।
यूँ
मेरे
साथ
कई
रातों
का
जागा
है
वो
चाँद
,
आज
तुम
जागो
मेरे
साथ
सहर
होने
दो।
थक
गए
हैं
यूँ
ही
भटकते
हुए
वीराने
में
,
दो
घडी
दिल
को
,
मेरे
ख्वाबों
का
घर
होने
दो
।
धडकनें
बन
के
तेरे
साथ
रहूँगा
हरदम
,
इक
दफा
मेरी
दुआओं
का
असर
होने
दो
।
फिर
न
मालूम
कब
आएगी
या
न
आएगी
आज
की
रात
इन
आँखों
में
बसर
होने
दो
।
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anay anand jha
There was a naughty boy And a naughty boy was he, For nothing would he do But scribble poetry— He took An ink stand In his hand And a pen Big as ten In the other..
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