Thursday, September 6, 2012

शिक्षक दिवस की संध्या पर.. एक श्रद्धांजलि गुरु को

इस वृहत जगत की परिधि में
मतलब थे , कुछ बेमतलब थे
प्रभु ने जो रच डाला था,
अद्भुत थे पर थे भेद भरे।

उत्सुक था मैं बेचैन मगर ,
भटका कितनी ही राहों पर
मंजिल पर खींच मुझे लाये,
तुम राह बनाते अग्रसर।

जीवन था लेकिन सुर न थे
जीने के मुझको गुर न थे,
एक लीक थाम चला पर
मंजिल के कुछ मंजर न थे।

क्या अर्थ-व्यर्थ ,क्या लोक-अलोक ,
क्या सत्य-धर्म ,क्यूँ हास्य शोक।
जो मतलब समझ न आये थे,
रख धैर्य तुम्ही ने गुरु मेरे वो बार-बार समझाए थे।

(सिर्फ )सिद्धांत नहीं व्यवहार मिला,
गुरु तुमसे नेह अपार मिला,
सीमित था मैं ,विस्तार मिला
तुमसे जीवन को सार मिला। 

No comments:

Post a Comment